Janmashtami 2020: जानिए जन्‍माष्‍टमी की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, आरती और व्रत कथा

Krishna Janmashtami 2020: भगवान विष्‍णु के अवतार 16 कलाओं से निपुण श्रीकृष्‍ण का जन्‍म भादो माही की कृष्‍ण पक्ष अष्‍टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था.

Janmashtami 2020

Janmashtami 2020: भगवान श्री कृष्‍ण के जन्‍मोत्‍सव को जन्‍माष्‍टमी के रूप में मनाया जाता है.

Janmashtami 2020: सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्‍णु के आठवें अवतार श्रीकृष्‍ण (Shri Krishna) के जन्‍म दिवस को जन्‍माष्‍टमी के रूप में मनाया जाता है. जन्‍माष्‍टमी (Janmashtami) हिन्‍दू धर्म के प्रमुख त्‍योहारों में से एक है, जिसे न सिर्फ भारत, बल्‍क‍ि दुनिया के हर उस कोने में धूमधाम से मनाया जाता है, जहां हिन्‍दू रहते हैं. यही नहीं दूसरे धर्म के लोग भी श्रीकृष्‍ण में गहरी आस्‍था रखते हैं और उनके जन्‍मोत्‍सव को पूरे हर्षोल्‍लास के साथ मनाते हैं. श्रीकृष्‍ण का जन्‍म द्वापर युग में भादो माह की कृष्‍ण पक्ष अष्‍टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. अधर्म पर धर्म की विजय के लिए धरती पर अवतरित हुए श्रीकृष्‍ण 16 कलाओं से निपुण और संपूर्ण ब्रह्मांड के पथ प्रदर्शक हैं. भक्‍त अपने प्‍यारे नटखट नंदलाल के जन्‍मदिन पर दिन भर व्रत रखते हैं और मध्‍य रात्रि यानी कि 12 बजे उन्‍हें पालने में झुलाते हैं.

जन्‍माष्‍टमी का त्‍योहार आमतौर पर दो दिन मनाया जाता है. इस बार भी जनमाष्‍टमी 11 अगस्‍त और 12 अगस्‍त को मनाई जाएगी. गृहस्‍थ 11 अगस्‍त को व्रत रखेंगे, जबकि वैष्‍णव यानी कि साधू-संत 12अगस्‍त को जन्‍माष्‍टमी का व्रत रखेंगे.

जन्‍माष्‍टमी की तिथि और शुभ मुहूर्त
जन्‍माष्‍टमी की तिथि: 11 अगस्‍त 2020 और 12 अगस्‍त 2020
अष्‍टमी तिथि प्रारंभ: 11 अगस्‍त 2020 को सुबह 9 बजकर 6 मिनट से.
अष्‍टमी तिथि समाप्‍त: 12 अगस्‍त 2020 को सुबह 11 बजकर 16 मिनट तक.

रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ: 13 अगस्‍त 2020 की सुबह 3 बजकर 27 मिनट से.
रोहिणी नक्षत्र समाप्‍त: 14 अगस्‍त 2020 को सुबह 5 बजकर 22 मिनट तक.

निशीथ काल में पूजा का समय
12 अगस्‍त 2020 को सुबह 12 बजकर 5 मिनट से 12 बजकर 48 मिनट तक
कुल अवधि: 43 मिनट
पारण का समय: 12 अगस्‍त को सुबह 11 बजकर 16 मिनट

कैसे मनाते हैं जन्‍माष्‍टमी
जन्‍माष्‍टमी को कृष्‍णाष्‍टमी, गोकुलाष्‍टमी, अष्‍टमी रोहिणी, श्रीकृष्‍ण जयंती और श्री जयंती के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन कृष्‍ण भक्‍त अपने आराध्‍य के जन्‍म की खुशी में दिन-भर व्रत रखते हैं और भजन गाते हैं. घरों में कई दिनों पहले से कृष्‍ण जन्‍म की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. नाना प्रकार के व्‍यंजनों, भोग और पंजीरी की खुश्‍बू से पूरा घर महक उठता है. कान्‍हा के लिए खास तौर से माखन-मिश्री का भोग तैयार किया जाता है. वहीं, मंदिरों को भी खूब सजाया जाता है और आधी रात को विशेष पूजा अर्चना कर भगवान के जन्‍मोत्‍सव की खुशियां मनाई जाती हैं.

जन्‍माष्‍टमी के व्रत के नियम

  • अगर आप जन्‍माष्‍टमी का व्रत कर रहे हैं तो एक दिन पहले यानी कि सप्‍तमी से व्रत के नियमों का पालन करें.
  • जन्‍माष्‍टमी के व्रत के दिन अन्न ग्रहण नहीं किया जाता है.
  • दिन भर उपवास रखें और फलाहार ग्रहण करें.
  • अगले दिन अष्‍टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्‍त होने के बाद व्रत का पारण करें.
  • जन्‍माष्‍टमी में एकादशी के व्रत के सभी नियमों का अनिवार्य रूप से पालन किया जाता है.

पूजन सामग्री
जन्‍माष्‍टमी के दिन कृष्‍ण पूजन के लिए सामग्री पहले से इकट्ठा कर लें. सामग्री इस प्रकार है: चौकी या लकड़ी का पटरा, पीला वस्‍त्र, बाल गोपाल की प्रतिमा, सिंहासन, लोटा, जल, गंगाजल, पंचामृत, दीपक, बाती, धूप, चंदन, अक्षत यानी कि चावल, घी, शहद, दही, दूध, माखन-मिश्री और भोग की अन्‍य सामग्री.

कान्‍हा के लिए श्रृंगार सामग्री
कान्‍हा के लिए संदर वस्‍त्र, छोटी सी बांसरी, मोर पंख, मुकुट, माला और इत्र.

जन्‍माष्‍टमी की पूजा विधि

  • जन्‍माष्‍टमी की पूजा नीशीथ काल यानी कि रात 12 बजे के बाद की जाती है. दरअसल, कृष्‍ण का जन्‍म आधी रात को ही हुआ था.
  • पूजा करने से पहले पानी में तिल मिलाकर स्‍नान कर लें.
  • अब पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठ जाएं और कृष्‍ण का ध्‍यान करें.
  • अब हाथ में जल लेकर संकल्‍प करें और मन ही मन कष्‍ण के बाल स्‍वरूप का आह्वान करें.
  • अब गोबर से प्रतीक स्‍वरूप देवकी जी के लिए प्रसूति गृह का निर्माण करें.
  • अब लड्डू गोपाल की मूर्ति को मंदिर में लेकर आएं.
  • कान्‍हा के लिए पहले से ही पालना सजा लें और 12 बजते ही उनका जन्‍म कराएं.
  • अब लड्डू गोपाल की मूर्ति को पंचामृत यानी कि दूध, दही, घी, शहद और स्‍वच्‍छ जल से स्‍नान कराएं.
  • अंत में गंगाजल से मूर्ति को स्‍नान कराएं.
  • अब लड्डू गोपाल को साफ कपड़ें से पोंछ दें और किसी नवजात बच्‍चे की तरह लंगोटी पहनाएं.
  • इसके बाद कान्‍हा को पालने में रखें और सुंदर वस्‍त्र पहनाएं.
  • उनके सिर पर मुकुट और मोर पंख सजाएं.
  • गले में माला पहनाएं और हाथ में बांसुरी रख दें.
  • अब उन्‍हें चंदन और अक्षत का टीका लगाएं.
  • इसके बाद श्रीकृष्‍ण की जन्‍म कथा सुनें.
  • कथा के बाद धूप-दीप से कान्‍हा की आरती उतारें.
  • फिर उन्‍हें भोग लगाएं. भोग में माखन मिश्री और तुलसी दल जरूर होने चाहिए.
  • अब भगवान को झूला झुलाएं. साथ ही “नंद के घर आनंद भयो, जय कन्‍हैया लाल की…” का जयकारा लगाएं.
  • श्रीकृष्‍ण के जन्‍म के समय मंगल गीत जरूर गाए जाने चाहिए.
  • इसके बाद परिवार के सदस्‍यों में प्रसाद वितरित करें.
  • रात भर जागरण करते हुए कृष्‍ण भजन गाएं.
  • अगले दिन अष्‍टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्‍त होने के बाद व्रत का पारण करें.

भगवान श्रीकृष्णजी की आरती
आरती कुंजबिहारी की श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
गले में बैजन्तीमाला बजावैं मुरलि मधुर बाला॥

श्रवण में कुंडल झलकाता नंद के आनंद नन्दलाला की। आरती…।
गगन सम अंगकान्ति काली राधिका चमक रही आली।

लतन में ठाढ़े बनमाली भ्रमर-सी अलक कस्तूरी तिलक।
चंद्र-सी झलक ललित छबि श्यामा प्यारी की। आरती…।

कनकमय मोर मुकुट बिलसैं देवता दरसन को तरसैं।
गगन से सुमन राशि बरसैं बजै मुरचंग मधुर मृदंग।

ग्वालिनी संग-अतुल रति गोपकुमारी की। आरती…।
जहां से प्रगट भई गंगा कलुष कलिहारिणी गंगा।

स्मरण से होत मोहभंगा बसी शिव शीश जटा के बीच।
हरै अघ-कीच चरण छवि श्री बनवारी की। आरती…।

चमकती उज्ज्वल तट रेनू बज रही बृंदावन बेनू।
चहुं दिशि गोपी ग्वालधेनु हंसत मृदुमन्द चांदनी चंद।

कटत भवफन्द टेर सुनु दीन भिखारी की। आरती…।

भगवान श्रीकृष्‍ण की जन्‍मकथा
द्वापर युग में मथुरा पर अत्याचारी राजा कंस का शासन था. वह अपने पिता राजा उग्रसेन को गद्दी से हटाकर स्वयं राजा बन गया था. उसके शासन में मथुरा की प्रजा उसके अत्याचार से बहुत दुखी थी. कंस की बहन देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ था. कंस एक बार अपनी बहन को वसुदेव के घर ले जा रहा था, तभी आकाशवाणी हुई- ”हे कंस! जिस बहन को तू उसके ससुराल छोड़ने जा रहा है, उसके गर्भ से पैदा होने वाली आठवीं संतान तेरी मृत्‍यु का कारण बनेगी.”

आकाशवाणी सुनकर कंस क्रोधित हो उठा और वसुदेव को मारने बढ़ा. तब देवकी ने अपने पति के प्राणों की रक्षा के लिए कहा कि जो संतान जन्म लेगी, उसे वो पहले उसके सामने लेकर आएगी. कंस ने बहन की बात मान ली. वो देवकी और वसुदेव को वापस मथुरा ले आया और कारागार में डाल दिया. कारागार में देवकी ने एक-एक करके सात बच्चों को जन्म दिया, लेकिन कंस ने उन सभी का वध कर दिया. आकाशवाणी के अनुसार अब देवकी की आठवीं संतान जन्म लेने वाली थी. ऐसे में कंस ने कारागार के बाहर कड़ा पहरा लगा दिया. संयोगवश उस समय ही नंद की पत्नी यशोदा भी गर्भवती थीं.

जिस समय देवकी ने अपने आठवीं संतान को जन्म दिया, उसी समय यशोदा ने एक पुत्री को जन्म दिया. देवकी ने अपनी कोख से सृष्टि के पालनहार श्री हरि विष्‍णु के अवतार श्रीकृष्‍ण को जन्‍म दिया था. श्रीकृष्‍ण के जन्‍म लेते ही देवकी के कारागार में अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान श्रीहरि विष्णु प्रकट हुए. उन्होंने वसुदेव से कहा कि आप इस बालक को अपने मित्र नंद जी के यहां ले जाओ और वहां से उनकी कन्या को यहां लाओ. भगवान ने वसुदेव से कहा, “तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो. इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है. फिर भी तुम चिंता न करो. जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी.” इतना कहकर भगवान विष्‍णु ने पुन: नवजात शिशु का रूप धारण कर लिया.

जब कृष्ण भगवान का जन्म हुआ तब घनघोर काली रात थी, बारिश हो रही थी और यमुना पूरे उफान पर थी. भगवान विष्णु के आदेश पर वसुदेव जी ने बाल कृष्ण को सूप में लिटा दिया और उन्‍हें अपने सिर पर रखकर नंद जी के घर की ओर प्रस्थान कर गए. भगवान विष्णु की माया से सभी पहरेदार सो गए, कारागार के दरवाजे खुल गए, यमुना ने भी शांत होकर वसुदेव को नंद जी के घर जाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया. वसुदेव भगवान कृष्ण को लेकर नंद जी के यहां सकुशल पहुंच गए और वहां से उनकी नवजात कन्या को लेकर वापस कारागार में आ गए. वसुदेव जी के वापस लौटते ही कारागृह के द्वार पहले की तरह ही बंद हो गए.

अब जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली वो तत्काल कारागार में आ पहुंचा. उसने देवकी से उस कन्‍या को छीन लिया और पृथ्‍वी पर पटकने ही वाला था कि तभी वो कन्‍या उसके हाथ से निकल कर आसमान में चली गई. फिर कन्या ने कहा- “हे मूर्ख कंस! तूझे मारने वाला जन्म ले चुका है और वह वृंदावन पहुंच गया है. अब तुझे जल्द ही पापों का दंड मिलेगा.” वह कन्या कोई और नहीं, स्वयं माया थी.

श्री कृष्‍म की जन्‍मकथा समाप्‍त हुई. जन्‍माष्‍टमी के दिन श्रीकृष्‍ण की जन्‍मकथा अवश्‍य सुननी या सुनानी चाहिए.

आप सभी को श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी की ढेरों शुभकामनाएं. जय श्री कृष्‍णा.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *